आखिर भारत के राजनीतिक दलों ने आरएसएस को इतनी छूट क्यों दी?

आरएसएस का गठन हुए 100 साल से ज्यादा बीत चुके हैं। लेकिन क्या कारण हैं कि न तो केंद्र और न ही किसी भी राज्य सरकार ने कभी उसकी कानूनी और वित्तीय जवाबदेही पर प्रश्न नहीं उठाए और न ही कभी आरएसएस से कहा कि वह अपने वित्तीय लेखें प्रस्तुत करे। पढ़ें, प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड का यह आलेख

कांचा आइलैय्या शेपर्ड July 18, 2026

यह पक्का समझिए कि पूरी दुनिया हमारी राजनीतिक प्रणाली को देख कर चकित रह जाती होगी। आज़ादी के बाद से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक इस देश पर 17 साल (1999 से 2004 तक और फिर 2014 से लेकर अब तक) तक राज कर चुके हैं और आरएसएस का केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों पर खासा प्रभाव है। इसके बाद भी न तो आरएसएस पंजीकृत और न ही किसी बैंक में उसका कोई खाता है।

दुनिया के किसी भी अन्य लोकतंत्र में शायद ही कोई अपंजीकृत और रहस्यों के आवरण में लिपटी संस्था अपनी राजनीतिक शाखा के ज़रिए देश पर राज करने की स्थिति में होगी।

मजे की बात यह है कि आरएसएस को यह छूट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दी है, जो अकेले या अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन में देश पर करीब 55 साल तक राज कर चुकी है। हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस सरकारों ने तीन मौकों पर आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था।

आरएसएस का कहीं कोई पंजीकरण नहीं है। इसकी तुलना में हिटलर की नात्सी पार्टी – जिसका आधिकारिक नाम नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी (एनएसडीएपी) था – तक पंजीकृत थी। पार्टी का पंजीकरण उससे जुड़ी एक संस्था एनएसडीएवी के ज़रिए 1920 में करवाया गया था। सन् 1923 में एक असफल विद्रोह – जिसे बियर हॉल पूच्छ कहा जाता है – के बाद नात्सियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। आगे चलकर पार्टी का पुनर्गठन किया गया और फरवरी, 1925 में उसे एक राजनीतिक संगठन के रूप में जर्मनी के बवेरिया प्रांत में पंजीकृत करवाया गया।

इतालवी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी की नेशनल फासिस्ट पार्टी, इटली की एक पंजीकृत और मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी थी। इसकी स्थापना 1919 में मुसोलिनी ने की थी। शुरुआत में इसकी शक्ल एक आंदोलन की थी। नवंबर, 1921 में उसे औपचारिक रूप से एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत किया गया और उसे मान्यता प्रदान की गई। 

भारत की हिंदू, मुस्लिम और ईसाई संस्थाएं      

भारत में हिंदू महासभा का गठन 1907 में हुआ था। सन् 1915 में उसका पुनर्गठन किया गया। सन् 1970 में संस्था ने सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत अपना पंजीकरण करवाया। 

स्वतंत्रता के पूर्व स्थापित कई प्रमुख मुस्लिम शैक्षणिक, धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं ने ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 अथवा ट्रस्टों से संबंधित कानूनों के तहत अपना पंजीकरण करवाया। सन् 1866 में स्थापित दारुल उलूम देवबंद, 1919 में स्थापित जमीयत उलेमा-ए-हिंद और 1894 में गठित दारुल उलूम नदवतुल उलमा – ये सभी पंजीकृत शैक्षणिक एवं धार्मिक संस्थाएं थीं, जिनका एक सुस्पष्ट संगठनात्मक ढांचा था और जिन्हें कानूनी मान्यता हासिल थी।नई दिल्ली के झंडेवालान में करीब 150 करोड़ रुपए की लागत से बनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नए कार्यालय की तस्वीर

जमात-ए-इस्लामी हिंद, जिसकी स्थापना 1941 में हुई थी और जिसे स्वाधीनता के बाद पुनर्गठित किया गया था, एक सामाजिक-राजनीतिक संगठन है। इसका भी पंजीकरण है। ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (स्थापना वर्ष 1906) तो एक विशुद्ध राजनीतिक संस्था थी, मगर वह भी औपनिवेशिक राजनीतिक व्यवस्था की हदों के भीतर काम करती थी। कुल मिलाकर, कई प्रमुख मुस्लिम संगठनों और संस्थाओं ने कानूनी ढांचे और पंजीकरण नियमों का पालन किया और अपनी संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित की। वे कानूनों की जद से बाहर नहीं थीं। 

स्वातंत्र्य-पूर्व भारत में मुख्यधारा की ईसाई शैक्षणिक, धार्मिक और गैर-सरकारी संस्थाओं ने भी सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 अथवा ट्रस्टों से संबंधित कानूनों के तहत बाकायदा अपना पंजीकरण करवाया। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय स्तर के चर्चों के संगठनों ने भी संबंधित कानूनों के तहत अपना पंजीकरण करवाया। कैथोलिक बिशप्स कांफ्रेंस ऑफ़ इंडिया का 1944 में संस्था के रूप में पंजीकरण करवाया गया। चर्च ऑफ़ साउथ इंडिया का पंजीकरण 1947 में हुआ, प्रेसबिटिरियन चर्च ऑफ़ इंडिया का 1924 में, चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया का 1924 में, मेथोडिस्ट चर्च इन इंडिया का 1981 में, इंडियन इवैंजेलिकल लुथेरन चर्च का 1958 में, यूनाइटेड इवैंजेलिकल लुथेरन चर्चेस इन इंडिया का 1975 में और कौंसिल ऑफ़ बैप्टिस्ट चर्चेस इन नार्थईस्ट इंडिया का पंजीकरण 1950 में हुआ।

मलंकरा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च 1934 में निर्मित अपने संविधान के तहत काम करता है, मगर उसके द्वारा संचालित ट्रस्ट पंजीकृत हैं। इसी तरह, सन् 1889 में अपने पुनर्गठन के समय से ही मारथोमा सीरियन चर्च अपने पंजीकृत ट्रस्टों के ज़रिए काम करता आ रहा है। जैकोबाईट सीरियन क्रिश्चियन चर्च का कोई एकीकृत राष्ट्रीय पंजीकरण नहीं है, मगर उसके धर्मप्रांत और उससे संबद्ध संस्थाएं पंजीकृत हैं। इसी तरह, बैप्टिस्ट चर्च ऑफ़ मिजोरम, राज्य के कानूनों के तहत पंजीकृत अपनी संस्थाओं के ज़रिए काम करता है।

जहां तक साईरो-मलाबार कैथोलिक चर्च और साईरो-मलान्कारा कैथोलिक चर्च सहित रोमन कैथोलिक चर्च का संबंध है, वे राष्ट्रीय स्तर पर अलग से पंजीकृत नहीं हैं, लेकिन उनके सभी धर्मप्रांत, महाधर्मप्रांत एवं उनके द्वारा संचालित शैक्षणिक व परोपकारी संस्थाएं और ट्रस्ट, भारतीय कानूनों के तहत संबंधित कार्यालयों में पंजीकृत हैं। इनमें से अधिकांश चर्च और संस्थान, सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकृत हैं और उसी के तहत अपना काम करते हैं। यह अधिनियम चर्चों, मिशनों, स्कूलों, अस्पतालों और गैर-सरकारी संस्थाओं के संचालन से संबंधित नियमों को निर्धारण करता है।

जातिगत कारणों से आरएसएस अपवाद बना हुआ है

आरएसएस का गठन हुए 100 साल से ज्यादा बीत चुके हैं। लेकिन क्या कारण हैं कि न तो केंद्र और न ही किसी भी राज्य सरकार ने कभी उसकी कानूनी और वित्तीय जवाबदेही पर प्रश्न नहीं उठाए और न ही कभी आरएसएस से कहा कि वह अपने वित्तीय लेखें प्रस्तुत करे। कानून के राज से जुड़ा यह मूलभूत प्रश्न कभी किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ने नहीं पूछा। अब, इतने साल बाद, कर्नाटक के युवा गृहमंत्री और दलित नेता प्रियंक खड़गे ने इस बारे में आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत को ठीक यही प्रश्न उठाते हुए एक पत्र लिखा है।

आरएसएस पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठाए जाने के पीछे हमारी जाति व्यवस्था है। आरएसएस की स्थापना ब्राह्मणवादियों द्वारा ब्राह्मणवादियों के हितों की रक्षा के लिए की गई थी। एक ब्राह्मण नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगाया गया। बाद में आरएसएस ने गांधी की जाति बनिया, जो भारत की प्रमुख व्यवसायी जाति है, से दोस्ताना संबंध बना लिये।

आरएसएस के नेतृत्व को यह अहसास हो गया कि बनियों के धन के बिना आरएसएस बहुत लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकेगा। धीरे-धीरे बनिया व्यवसायी, आरएसएस की आर्थिक रीढ़ बन गए। इसी ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ के कारण कोई सरकार या नेता – चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न रहे हों – कभी आरएसएस के कानूनी दर्जे पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा सके। यह इसलिए और भी आसान हो गया क्योंकि सत्ता पर इन्हीं दोनों जाति समूहों का कब्ज़ा था। 

भारत में आज भी कई अपंजीकृत संस्थाएं और पार्टियां हैं, जिनमें नक्सली शामिल हैं। मगर वे खुल्लम-खुल्ला काम नहीं करते। वे भूमिगत हैं। और ऐसे समूहों और संस्थाओं का सभी पार्टियों की सरकारें दमन करती आईं हैं। अब तो आरएसएस-भाजपा के लोग जश्न मना रहे हैं कि उन्होंने नक्सलियों को करीब-करीब पूरी तरह से कुचल दिया है।

लेकिन आरएसएस सत्ता का केंद्र और स्रोत बना हुआ है। केंद्र और देश के कई राज्यों की सरकारें उसके नियंत्रण में हैं। मगर आरएसएस न तो पंजीकृत है, न किसी भी बैंक में उसका खाता है और कथित तौर पर विदेशों से धन प्राप्त करने के बाद भी उसका एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) के तहत पंजीकरण नहीं है। क्या यह बहुत अजीब नहीं है? 

बिना जवाबदेही की सत्ता

आरएसएस का दावा है कि वह एक गैर-सरकारी संस्था (एनजीओ) है। तो फिर अन्य एनजीओ की तरह वह पंजीकृत क्यों नहीं है? वह आयकर रिटर्न दाखिल क्यों नहीं करता? और अगर उसे विदेशों से धन प्राप्त होता है तो वह एफ़सीआरए के अंतर्गत पंजीकृत क्यों नहीं है?

भाजपा सरकार मनमाने ढंग से एनजीओ के एफ़सीआरए लाइसेंस रद्द कर रही है और उनके खातों को फ्रीज कर रही है। लेकिन अगर आरएसएस या उससे संबद्ध संस्थाओं को विदेशी स्रोतों से चंदा मिलता है तो उसकी तहकीकात क्यों नहीं हो रही है?

क्या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम (जो कुछ समय तक गृहमंत्री भी थे) को यह सब पता नहीं था? क्या कारण है कि चिदंबरम ने वे प्रश्न कभी नहीं उठाए जो आज खड़गे उठा रहे हैं? ज्ञातव्य है कि विदेशों से मिलने वाले चंदे के नियमन संबंधी कानून इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में बने थे।

चिदंबरम ने वित्त मंत्री बतौर यह नियम बनवाया था कि हर संस्था के एफ़सीआरए प्रमाणीकरण की हर पांच साल में समीक्षा होनी चाहिए। मगर उनकी सरकार ने कभी आरएसएस से यह नहीं पूछा की वह पंजीकृत क्यों नहीं है या भारत में या अन्य देशों के साथ उसका आर्थिक लेन-देन क्या है? यहां तक कि आपातकाल में – जब आरएसएस के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया था – भी संघ की गतिविधियों के इस पक्ष की अनदेखी की गई।

कम्युनिस्ट पार्टियों ने पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा पर दशकों तक राज किया। लेकिन वे भी आरएसएस के मामले में चुप रहीं। ममता बेनर्जी ने पश्चिम बंगाल में अपने 15 साल के शासनकाल में इस मामले में क्या किया? समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी  (उत्तर प्रदेश) और राष्ट्रीय जनता दल (बिहार) क्या अपने राज में आरएसएस से कुछ पूछताछ कर सके? आरएसएस इन सभी राज्यों में सक्रिय था और अब एक-एक करके उनके ऊपर कब्ज़ा जमा रहा है।

मोहन भागवत का कहना है कि “हिंदू धर्म की तरह, आरएसएस को भी पंजीकरण करवाने की ज़रूरत नहीं है?” अगर धार्मिक संस्थाओं को पंजीकरण करवाने और बैंक खाते खोलने की ज़रूरत नहीं है तो फिर आरएसएस-भाजपा सरकारें, ईसाई धार्मिक संस्थाओं से कानूनी और आर्थिक जवाबदेही की अपेक्षा क्यों रख रही हैं? आरएसएस यह तो चाहता है की इडी, सीबीआई और आयकर विभाग कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं के घरों और दफ्तरों पर छापे मारें, मगर वह अपने काम करने के तरीके और आर्थिक लेन-देन की कोई पड़ताल नहीं चाहता।

कीमत चुका रहे हैं बहुजन

अब तो यह साफ़ है कि आरएसएस संविधान और कानून के राज का तनिक भी सम्मान नहीं करता। और यही शूद्र, दलित और आदिवासी जनता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। ये वर्ग भारत के बहुसंख्यक हैं। वे हिंदुओं में भी बहुसंख्यक हैं। मगर आरएसएस की नीतियों के निर्धारण में उनकी कोई भूमिका नहीं है। पिछले 100 सालों में कभी भी उन्हें आरएसएस का नेतृत्व करने का मौका नहीं मिला।

बहुजनों ने वर्णधर्म – जिसके अंतर्गत ब्राह्मण पंडितों की कही बात को पत्थर की लकीर माना जाता है – के चलते घोर कष्ट भोगे। और अब भागवत भी उसी व्यवस्था का समर्थन कर रहे हैं। आरएसएस का रहस्यपूर्ण चरित्र, चाल और चेहरा; शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के लिए धार्मिक अल्पसंख्यकों की तुलना में अधिक बड़ा खतरा है। कारण यह कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के बचाव के लिए आध्यात्मिक रूप से संगठित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ढांचे हैं। मगर शूद्र, दलित और आदिवासी तो ब्राह्मणवादी ताकतों के संपूर्ण नियंत्रण में हैं। उनसे तो कहा जाता है कि वे हिंदू हैं।

आज हालत यह है कि एक संगठन, जिसका केंद्रीय और राज्य सरकारों पर जबरदस्त नियंत्रण और प्रभाव है, जो सरकारों की नीतियों के निर्धारण में महती भूमिका निभाता है, उसका कहना है कि कानून उसकी पड़ताल नहीं कर सकता। क्या भारत का संविधान और उसका लोकतंत्र ऐसे संगठन के बोलबाले के चलते सुरक्षित है?

जैसा कि आंबेडकर ने कहा था कि अनैतिक ताकतों के शासन में कोई नैतिक संविधान काम नहीं कर सकते। जाति का हर चीज़ का निर्धारक बन जाने से लोकतंत्र का अंत अवश्यंभावी है। 

यह निश्चय ही प्रसन्नता का विषय है कि एक दलित – जो जाति व्यवस्था के सबसे बड़े पीड़ित समुदाय का सदस्य है – ने इस मामले में पहल की है और हिम्मत के साथ यह मुद्दा उठाया है। प्रियंक खड़गे ने इस मामले को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाकर देश का भला किया है। आरएसएस को चाहिए कि वह या तो अपना पंजीकरण करवाकर अपने संगठन और लेखों का पूरा खुलासा करे या फिर अपना काम बंद कर दे।

(यह आलेख पूर्व में अंग्रेजी में वेब पत्रिका  वायरद्वारा प्रकाशित है तथा यहां हिंदी अनुवाद लेखक की सहमति से प्रकाशित है।)

https://www.forwardpress.in/2026/07/politics-analysis-rss-priyank-kharge/

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